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मैं राम नहीं बन पाया

अमित 'तन्हा'अमित 'तन्हा' September 23, 2022
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तुम बिल्कुल वैदेही जैसी, 
पर मैं राम नहीं बन पाया
अनमोल रत्न सा प्रेम तुम्हारा,
जिस का मैं दाम नहीं बन पाया

मौन धरे तुम नयनों में,
कई स्वप्न सजाती होंगी
बस, उनको साकार करूं,
वह परिणाम नहीं बन पाया

तेरी मेरी प्रीत अटुट है,
जैसे प्राण संग काया
किंतु, तेरे कुछ रंगों में,
मैं खुद को नहीं रंग पाया

तेरा हर क्षण निछावर,
मुझ पर नित्य ही करती हो
तुझ में राधा सा समर्पण,
पर मैं श्याम नहीं बन पाया 

- अमित 'तन्हा'

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