मुझ को खबर नहीं's image
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बस याद हैं वो चंद पल, जो हमने साथ गुजारे,

कब खत्म हुई अपनी बात, मुझ को खबर नहीं...


छान लिए शहर के सारे मोहल्ले और गलियारे, 

कहाँ से निकली तेरी बारात, मुझ को खबर नहीं...


तुम इतने दूर हो गए, जितने चादँ-सितारे,

कैसे होगी फिर मुलाक़ात, मुझ को खबर नहीं...


मझधार में है मैरी नैया, नहीं लग रही किनारे,

कौन निभाएगा मेरा साथ, मुझ को खबर नहीं...


तुम्हारे बिना बेमतलब हैं ये हसीन नजारे, 

क्या दिन है और क्या रात, मुझ को खबर नहीं...


पतझड़ सी बेदम लगती हैं ये रंगीन बहारें,

कितने ग़मगीन हैं हालात, मुझ को खबर नहीं...


घेर रहीं हैं मुझे तन्हाई के अंधेरों की दीवारें,

क्यों नहीं होता आशा का प्रभात, मुझ को खबर नहीं...


अब इस दुनिया मैं जिऊँ भी तो किसके सहारे,

किसे समझाऊँ अपने जज़्बात, मुझ को खबर नहीं...


~ अम्बुज गर्ग

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