कितना बदल गया इंसान's image
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ग़ालिब की शायरी में जो ऊँचे ख़यालात और गहरे जज़्बात थे,

आज की नई पीढ़ी मे वो फ़न और अंदाज़ कहाँ है,


आईने में अक्स देखकर तैरती मछली की आँख बीन्ध देते थे, 

इस कलियुग में अर्जुन जैसे अब तीरंदाज़ कहाँ हैं,  


आज तूफानों के बवंडर मे डूब रही है हमारी लोहे की कश्तियाँ, 

बचपन में बारिश के पानी में चलने वाले वो कागज़ के जहाज कहाँ है, 


दौलत कमाने की इस भाग-दौड़ में कहीं खो गयी है खुशियाँ, 

अंजाम सबको मालूम है पर सही मायने में जीने का आगाज कहाँ है, 


यूँ तो सोशल मीडिया के माध्यम से हज़ारों दोस्तों से जुड़े है, 

पर दो पल साथ बैठ कर दिल की बात समझने वाले वो हमराज कहाँ है, 


इश्क़-मोहब्बत में लोग जान देने की कसमें खाते हैं आज भी, 

पर वतन की खातिर मर-मिटने वाले अब वो जांबाज कहाँ हैं ।  


~ अम्बुज गर्ग


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