अपनी बोली's image
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शिष्टाचार ही मिलती है पागलपन नहीं मिलता

गैरों की बोली में अपनापन नहीं मिलता


अपनी भाषा माँ का आँचल याद हमेशा आती है

द्वेष,क्रोध,विलाप हो जितना, हर भाव समझाकर जाती है

 

पर भाषा के बल पर चाहे समृद्ध जितने भी हो जाओ

पर वहाँ पर डटें रहने की दृढ़ता अपनी भाषा से हीं पाओ

 

किराए के मकान में कभी आँगन नहीं मिलता

गैरों की बोली में अपनापन नहीं मिलता


चाहे जितना लेख लिखो तुम, चाहे जितने व्याख्यान करो

गैरों की भाषा में चाहे, तुम खुद पर अभिमान करो


पर जब चोट हृदय को पहुंचे जो पहली बोली आती है

अपनी हीं भाषा की तुमको याद दिला के जाती है

 

मन की बात सुनाने को तब, कोई शब्द नहीं मिलता

गैरों की बोली मे अपनापन नहीं मिलता

 

भरे समाज में चाहे जितनी, भाषण की वाह वाही हो

चाहे जितने लोगों ने, तुम्हारी पीठ थपथपाई हो


लेकिन जब कोई अपना, अपनी भाषा में तारीफ करे

तब ऐसा लगता है जैसे, आशीष को मेरे शीर्ष धरे


राह से भटके राही को दामन नहीं मिलता

गैरों के बोली में अपनापन नहीं मिलता


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