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मैं तुम्हारी मेज पर सजी किताबें

Kuldeep DwivediKuldeep Dwivedi December 15, 2021
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करीने से सजी किताबे मेज पर झांकती हुई अब बोलती है मुझसे....बात तो नही करती पर बोलती है.... बेतहाशा बोलती है....कभी कभी कहती है आओ अब मुंह उठा कर किस इब्तिदा में खो रहे हो....एक मुक्कमल जहा थी कभी मैं तुम्हारी....पर अब जब से तुम भूले हो हमे निहारना....किसी और ने हमे उस शिद्दत से देखा भी नही छूना तो दूर की बात ही हुई फिर....जिस सरगोशी से तुम खो गए थे हमे पढ़ते हुए वो दीवानगी भी नही दिखी अब हमे खुद में किसी और के लिए।।

आना जरूर आना एक मुद्दत से इंतजार में है हमसब के सब यहा धूल फांकते हुए चढ़ी गर्द चेहरों पर लिए.... हटाना जरूर हटाना और खोलना वो पन्ना जिसे पढ़ तुमने महसूस किया था हमे अपने दिल के करीब....और हम बन गए थे तुम्हारे कुछ दिन के ही सही पर एक मुख्तसर सी उम्र के वो साथी जिसे पढ़ तुमने महसूस किया था कभी अपने आसमानी उड़ानों वाले पंखों में एक नई जान....और उड़ चले थे छूने अपने हिस्से के उस आकाश को जिसे पता नही कब से था तुम्हारा इंतजार।।
जब भी आओ तो आना ढेर सारा वक्त लेकर और वही अहसास कि करनी है तुमसे बहुत सारी बातें वो बातें जिन्हे हम दफ्न किए हुए थे इक लंबी इंतजारी सरीखे वक्त में.... हा ये सच है हमे करनी है अब तुमसे ढेर सारी वो बातें जो हुई ही नहीं....
तुम आना तो एक कपड़ा भी लाना सिर्फ इसलिए कि पोंछ सको हमारी गर्द को और पढ़ सको हममें लिखा वो सत्य जो अभी भी पर्दानशी ही है....
हम वही है....तुम्हारी मेज पर करीने से सजी किताबे जिन्हे तुम उठा लाए थे कभी अलीगंज भूतनाथ और अमीनाबाद की दुकानों से....और की थी अपनी रातें हमारे हवाले सिर्फ जागने के लिए.... सिर्फ जागने के लिए।।

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