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वो देख नहीं पायेंगें,

तुम्हारी आंखों में उभरते हुए नये स्वप्न

वो सहन नहीं कर पायेंगे

तुम्हारे नये शब्दों की चुभन ।

वो सहन नहीं कर पायेगें

तुम्हारे बदले हुए स्वर,

वो नहीं कर पायेंगे सहन

नये पथों पर चलते हुए तुम्हारे पांव

वो नहीं कर पायेंगे सहन

तुममें होता हुआ बदलाव ।

तुम्हारे अंदर सच झूठ में

अंतर कर पाने की विकसित दृष्टि

चुनना अपने पथ अपने आप

क्योंकि ये वो नहीं होगा,

जो वो देखना ,सुनना चाहते हैं।

या चाहते हैं,

जिन रास्तों पर तुम्हें चलते हुए देखना

या चाहते हैं,

तुम्हें जो बनता हुआ देखना।



2. चुभते हैं तुम्हारे स्वप्न

उनकी आंखों में किरचों की तरह,

तुम्हारे स्वछंद पांवों से

उनके अहम को लगती है ठेंस।


तुम्हारी ऊंची आवाज़ वाली उन्मुक्त हंसी,               

जैसे घोलती है पिघला हुआ शीशा उनके कानों में  

  तुम्हारा बेधड़क, बेझिझक ,बेबाक

जीवन जीने का तरीका नहीं सुहाता उन्हें जरा भी ।


वो देते हैं ,वो देगें पहले तुम्हें

लज्जा, शील ,मान ,मर्यादा की दुहाई,

इस पर भी तुम न मानी

तो और हठकंडे अपनायेगें ,

राहों पर आने वाले, आसन्न खतरों से डरायेगें

तोड़ने का प्रयास करेंगें तुम्हारा साहस ।


इस पर भी न डिगी तुम

तो करेगें फरमान जारी

कि तुम्हारे लिए कुछ भी चुनने का

अंतिम अधिकार हमारा है।


तुम्हारी जिद

अपने निर्णय स्वयं लेने की

गलत है सर्वथा गलत

तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो ।


इस पर भी न झुकी तुम

तो अपना आखिरी अस्त्र चलायेंगे,

भावनाओं में तुम्हें बहायेंगे,

इस पर भी तुम

यदि रही अडिग अपने फैसले पर

तो या तो टेक देगें घुटने

या फिर हमलावर हो जायेगें।

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