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मन के छाले

aktanu899aktanu899 March 21, 2022
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रह गये अकथ अंधेरे सब ,

जो हुए प्रकट छद्म थे उजाले।

मुख का हास सबने देखा

देख सका कौन

मन है अंदर ही अंदर

कितनी व्यथाएं है पाले।

क्लांति अनवरत चलने की तो मुख से झलकी 

देख सका कौन मगर

अनचाहे पथ पर चलने की पीड़ा से उपजे

पांवों के मन के छाले।


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