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आहत होना और आहत करना

aktanu899aktanu899 July 28, 2022
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आजकल हम हर छोटी छोटी बातों से आहत हो जाते हैं ।आहत की इतनी तीव्र प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते हैं की और लोग इसको सुनें और अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करें ।फिर बहस शुरू हो हर जगह समाचार पत्रों में, टीवी पर, सोशल मीडिया पर, गली ,नुक्कड़ चौराहों पर तब तक जब तक बात बड़ी न हो जाए ।बात कोर्ट कचहरी तक पहुंच जाती हैं।धमकियां , फौजदारी की नौबत आ जाती है कत्ल तक हो जाते हैं।आहत होना और आहत करना हमारा मुख्य चारित्रिक गुण बनता जा रहा है।जब तक हम किसी को आहत कर न लें या किसी बात से आहत हो न लें हमारा खाना नहीं पचता है।उस दिन रात में पान की दुकान पर रमेश जी मिल गये काफी दुखी से लग रहे थे मैंने सहृदयता के नाते पूछ लिया कि क्या बात है आप इतने दुखी क्यों हैं।बस इस बात पर उनका गुबार फट पड़ा ।बोले यार हमारी कालोनी के मेन गेट के बाहर रोड पर एक बड़ा गढ्ढा था नगर निगम वालों ने उसे बिना किसी पूर्व सूचना के रात में भर दिया ।मैंने कहा ये तो खुश होने वाली बात है।रमेश जी बोले यार तुम समझते नहीं वो गढ्ढा हमारी कालोनी की पहचान बन गया था।बाहर से आते हुए तेज रफ्तार गाड़ियों के लिए वो स्पीड ब्रेकर का काम करता था।दूर से कहीं से थके मांदे आते हुए जब हमें कालोनी के प्रवेश द्वार पर गढ्ढा दिखता था तो हमें घर लौटने का सुखद एहसास होता था।लोगों को हम अपनी कालोनी का पता बताते हुए गढ्ढे को लैंडमार्क की तरह गौरव के साथ बताते थे।सच तो ये है बंधु उस गढ्ढे के साथ महीनों से जीते जीते हमारा उसके साथ एक भावनात्मक लगाव हो गया था।तुम बताओ अगर तुम्हारी इतनी प्रिय चीज रातों रात कोई बिना किसी पूर्व सूचना के छीन ले तो तुम्हें कैसा लगेगा।उन्होंने कहा मैं तो सोचता हूं कि समस्त कालोनी वालों के साथ मिलकर नगर निगम के विरुद्ध एक विरोध प्रदर्शन कर डालूं पुनः वैसा ही गढ्ढा करने की मांग के साथ।मैं समझ गया कि रमेश जी नगर निगम के दुष्कृत्य से बहुत ही आहत हैं।तभी अचानक मुझे खांसी आई और मैं मुंह पर हाथ नहीं रख पाया तो मेरे मुंह से निकल कुछ छींटें उनके मुख पर भी पड़ गये। बस रमेश भड़क गये और बोले यार आपको तमीज नहीं है आपने मेरे मुंह के ऊपर खांस दिया आपको पता है कि आपके मुंह से उड़ते हुए कीटाणु मुझे बीमार कर सकते हैं।मैं आपकी गलती से गंभीर रूप से बीमार हो सकता हूं।मुझे आप जैसे पढ़े लिखे व्यक्ति से इस तरह के उजड्डपने की आशा नहीं थी।मैं समझ गया कि मैंने भी रमेश जी को आहत कर दिया है और यहां से चुपचाप खिसकने में ही भलाई है।

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