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उफ्फ मेरा चाँद


न जाने कितनों को दीवाना बनाएगा

कभी दीवाना हुआ बादल

कभी दीवाने हुए कायल

उफ्फ मेरा चाँद…


न जाने कितनों को भला तड़पायेगा

कभी यह घन में छुपता

कभी यह मन में छुपता

उफ्फ मेरा चाँद…


न जाने कौन सी पीड़ को छुपाता दिल में

कभी इसका आकार घटता-बढ़ता

कभी तन पे में काला धब्बा दिखता

उफ्फ मेरा चाँद…


न जाने कौन सी अदा है इसके फलक पर

कभी इसमें महबूब नजर आए

कभी इसमें महबूबा नजर आए

उफ्फ मेरा चाँद…


न जाने कब तृप्त होंगे मन भी नयन भी

कभी कोई चकोर रात भर तकता 

कभी दीवाना दिनभर आहें भरता

उफ्फ मेरा चाँद…


न जाने मेरे चाँद को किसकी नजर लगी

कभी अमावस की रात होती है

कभी नभ में बदल घुमड़ते हैं

उफ्फ मेरा चाँद…


न जाने चाँद के चांदनी की शीतलता मिलेगी

कभी बरगद के पेड़ों से ओझल होती हैं

कभी वो बदल के पीछे छुप जाती है

उफ्फ मेरा चाँद…


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