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हैरान, परेशान

Ajay JhaAjay Jha March 12, 2022
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हैरान, परेशान
इस दुनिया से अनजान
जब देखता हूँ अपने आस पास्
महसूस करता हूँ एक तुफान।

जो ना पत्ते उड़ाती है 
ना पेड़ों को गिराती
बस तीरती है अंतरमन
और भूला देती है पहचान।

हवा देती है अमानवीय भावों को
मिलती है ईर्ष्या, घृणा, द्वेष से
खिलती अनिति भ्रटाचार से
दौड़ती मनुष्यता को चीरती।

हैरान, परेशान
मेरा मन उसे देखता है
हुजूम को उसमें समाते देख
हो जाता है उसमें वीलिन।


अजय झा **चन्द्रम्**

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