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याद की खिड़की

अबोध मनअबोध मन January 1, 2022
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याद की एक खिड़की खुली रह गई...

एक तस्वीर मन की दीवार पर टंगी रह गई।


वक्त के साथ यहाँ सब गुज़रता ही गया,

न जाने क्यों मैं हर बार वहीं की वहीं रह गई।


नया सवेरा; उजाला हर सूं बिखर गया,

मन के एक कमरे में पहुँचनी रोशनी रह गई।


सोने सा दिल लिए हर शख़्स सँवर गया,

कि मैं ”अबोध” मिट्टी से खेलती, सनी रह गई।

...

#अबोध_मन

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