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| सुनो कान्हा |

अबोध मनअबोध मन January 7, 2022
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सुनो,कैसे खोजूँ,

कि कैसे सहेजूँ

कहो कैसे समेटूँ,

स्वयं को मैं कान्हा!

...

जितना तड़पूँ,

उतना ही तरसूँ,

कितना भी बरसूँ,

स्वयं; भींगूँ मैं कान्हा!

...

ये चित मेरा,

जपे नाम तेरा,

कित डालूँ डेरा,

स्वयं; हारूँ मैं कान्हा!

...

तुमसे बिछोह,

टूटा पाश मोह,

दर्पण लेत टोह,

स्वयं;कैसे सवारूँ मैं कान्हा!

...


उज्जवल भोर,

किन्तु! मैं चकोर,

प्रीत; तम से जोड़,

स्वयं; ‘श्याम’ बनूँ मैं कान्हा!

...

©अबोध_मन//“फरीदा”

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