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ओस जैसी ज़िन्दगी

Abhinav SinghAbhinav Singh July 20, 2021
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हरे झुकते पत्तों पर

सरसराती सी फिसलन

घास पर हीरे के जैसे हो रखी

कोई नयी नवेली दुल्हन

अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश

क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस


तेरा अस्तित्व तेरा वजूद तब दिखता

जब बूंदों से होती ये ज़मीं पावन

बिन बारिश न है तू

जब होती तो पल में सिमटता तेरा जीवन

अंततः रिसते हुए जाती मिटटी के आगोश

क्यूँ इतनी छोटी जिन्दगी होती तेरी ओस


जिंदगी चाहे छोटी हो

पर हंसी हरपल बनी रहे

कुछ ओस से ही सिख ले

कि चमक हरपल सजी रहे

अंततः तुझे जाना है

मिटटी के आगोश

फिर भी ज़िन्दगी जीना

तू सिखला जाती ओस

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