कहीं मिलूँ तो बताना's image
Poetry3 min read

कहीं मिलूँ तो बताना

vikas bansalvikas bansal August 29, 2022
Share1 Bookmarks 190 Reads2 Likes
मैं कहीं खोया हुआ हूँ . कहीं मिलूँ तो बताना 
मैं सोया हुआ हूँ बीते कुछ सालों से 
बुद्ध बनकर आना मेरी सुप्त चेतना को जगाना 
मैं खोया हुआ हूँ, हाँ देह में ही
उसे दिखाकर मुझे फिर मत रिझाना 
हो सके तो मेरे मन को छूना और तृप्त कर जाना
मैं अगर कहीं मिलूँ तो बताना
मैं वो नहीं जो कहा गया और सुनाया गया
अभी कई प्रषट् है जिन्हें कभी पढ़ा ही नहीं गया
उन्हें एक एक करके पढ़ना तसल्ली के साथ
फिर मुझे समझाना, मेरी कुछ ग़लतियाँ और नादानियाँ भी बता देना
एक नया पाठ सिखा देना
मैं कहीं मिलूँ तो बताना

वैसे तो एक दर्पण है मेरे पास,मैं ख़ुद को देख पाता हूँ
कहीं कहीं चमक भी है और कही दाग़ धब्बे भी है
मैं दोनो में साफ़ फ़र्क़ कर पाता हूँ
मुझे मंज़िलो का भी पता रहा और रास्तों का भी
पर साथ में इंतज़ार भी रहा एक फ़रिश्ते का 
कहीं मिले तो बताना
शायद साथ में हम थोड़ा और ऊँचा उड़ पाते नए आसमान को छू पाते
मैं सब छोड़ तुम्हारी तलाश में निकला
और मंज़िले बुरा गयी
कुछ पंख टूट गये और हम ख़ुद से थोड़ा दूर हो गए
अगर कहीं फिर से मैं आत्मविश्वास , आत्मसम्मान लिए मिलूँ बताना

इसीलिए शायद तुम नहीं मिले
और शायद अब मिलोगे भी नहीं
अगर शायद ख़ुद से प्यार कर पाता, स्वीकार कर पाता तो शायद तुम्हें भी महसूस कर पाता
फिर क्या मुझे तुम्हारी ज़रूरत होती?
ओह ज़रूरत ?
मुझे लगता है कि मेरी खोज का आधार ही ग़लत था 
मैंने अपनी ज़रूरतों में प्यार तुम्हें ढूँढा
प्यार ज़रूरत और स्वार्थ का नाम नहीं हो सकता शायद फिर देने का नाम होगा
  पर कब और कैसे?
उत्तर शायद मेरी पूर्णता में या विचारों और कर्मों के पारस्परिक समन्वयो में हो सकता है
प्यार पूर्णता प्राप्त करने साधन नहीं हो सकती, शायद मेरी पूर्णता या तृप्ति ही प्यार को जन्म देगी

मैं अब यह सब जान चुका हूँ, मर्म पहचान चुका हूँ
पर मुझे पता है, मैं एक दिन यह सब भूल जाऊँगा
उस दिन फ़रिश्ता बनकर मुझे नींदो में मिलना
 और यह सब बतलाना
पर मुझे पता है फिर तुम नही आओगे
शायद फ़रिश्ते सिर्फ़ कहानियो में होते है
असल ज़िंदगी में ख़ुद को ही फ़रिश्ता बनना पड़ता है
आग में तपकर कंचन बनना पड़ता है
तो फिर कभी इन्हि कोशिशों में मिलूँ तो बताना

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts