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मुश्ताक़ हैं उश्शाक़ तिरी बाँकी अदा के

Wali Muhammad WaliWali Muhammad Wali
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मुश्ताक़ हैं उश्शाक़ तिरी बाँकी अदा के

ज़ख़्मी हैं मोहिब्बाँ तिरी शमशीर-ए-जफ़ा के

हर पेच में चीरे के तिरे लिपटे हैं आशिक़

आलम के दिलाँ बंद हैं तुझ बंद-ए-क़बा के

लर्ज़ां है तिरे दस्त अगे पंजा-ए-ख़ुर्शीद

तुझ हुस्न अगे मात मलाएक हैं समा के

तुझ ज़ुल्फ़ के हल्क़े में है दिल बे-सर ओ बे-पा

टुक मेहर करो हाल उपर बे-सर-ओ-पा के

तन्हा न 'वली' जग मुनीं लिखता है तिरे वस्फ़

दफ़्तर लिखे आलम ने तिरी मद्ह-ओ-सना के

 

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