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कूचा-ए-यार ऐन कासी है

Wali Muhammad WaliWali Muhammad Wali
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कूचा-ए-यार ऐन कासी है

जोगी-ए-दिल वहाँ का बासी है

पी के बैराग की उदासी सूँ

दिल पे मेरे सदा उदासी है

ऐ सनम तुझ जबीं उपर ये ख़ाल

हिंदवी हर-द्वार बासी है

ज़ुल्फ़ तेरी है मौज जमुना की

तिल नज़िक उस के जियूँ सनासी है

घर तिरा है ये रश्क-ए-देवल-ए-चीं

उस में मुद्दत सूँ दिल उपासी है

ये सियह-ज़ुल्फ़ तुझ ज़नख़दाँ पर

नागनी ज्यूँ कुँवे पे प्यासी है

तास-ए-ख़ुर्शीद ग़र्क़ है जब सूँ

बर में तेरे लिबास-ए-तासी है

जिस की गुफ़्तार में नहीं है मज़ा

सुख़न उस का तआ'म बासी है

ऐ 'वली' जो लिबास तन पे रखा

आशिक़ाँ के नज़िक लिबासी है

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