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किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता

Wali Muhammad WaliWali Muhammad Wali
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किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता

कि आतिश गुल कूँ करती है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता

वफ़ादारी ने दिलबर की बुझाया आतिश-ए-ग़म कूँ

कि गर्मी दफ़ा करता है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता

अजब कुछ लुत्फ़ रखता है शब-ए-ख़ल्वत में गुल-रू सूँ

ख़िताब आहिस्ता आहिस्ता जवाब आहिस्ता आहिस्ता

मिरे दिल कूँ किया बे-ख़ुद तिरी अँखियाँ ने आख़िर कूँ

कि ज्यूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता आहिस्ता

हुआ तुझ इश्क़ सूँ ऐ आतिशीं-रू दिल मिरा पानी

कि ज्यूँ गलता है आतिश सूँ गुलाब आहिस्ता आहिस्ता

अदा ओ नाज़ सूँ आता है वो रौशन-जबीं घर सूँ

कि ज्यूँ मशरिक़ सूँ निकले आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता

'वली' मुझ दिल में आता है ख़याल-ए-यार-ए-बे-परवा

कि ज्यूँ अँखियाँ मनीं आता है ख़्वाब आहिस्ता आहिस्ता

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