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इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है

Wali Muhammad WaliWali Muhammad Wali
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इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है

हुस्न मुश्ताक़-ए-दिल-नवाज़ी है

अश्क ख़ूनीं सूँ जो किया है वज़ू

मज़हब-ए-इश्क़ में नमाज़ी है

जो हुआ राज़-ए-इश्क़ सूँ आगाह

वो ज़माने का फ़ख़्र-ए-राज़ी है

पाक-बाज़ाँ सूँ यूँ हुआ मफ़्हूम

इश्क़ मज़मून-ए-पाक-बाज़ी है

जा के पहुँची है हद्द-ए-ज़ुल्मत कूँ

बस-कि तुझ ज़ुल्फ़ में दराज़ी है

तजरबे सूँ हुआ मुझे ज़ाहिर

नाज़ मफ़्हूम बे-नियाज़ी है

ऐ 'वली' ऐश-ए-ज़ाहिरी का सबब

जल्वा-ए-शाहिद-ए-मजाज़ी है

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