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कीलों से जड़ दिया गया हूँ

Shambhunath Singh(शम्भुनाथ सिंह)Shambhunath Singh(शम्भुनाथ सिंह)
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फ़ुटपाथों की दीवारों पर
कीलों से जड़ दिया गया हूँ।

नंगी सुबहें, भूखी शामें,
पहरा देतीं मुझको घेरे;
व्यर्थ हो गईं सब रोशनियाँ,
बेमानी हो गए अँधेरे!

चार दिशाओं की चौखट में
शीशे से मढ़ दिया गया हूँ!

मंदिर के घेरे के बाहर
एक शिलाखंड-सा गड़ा हूँ;
मरा हुआ देवता बना मैं
सब-कुछ को झेलता खड़ा हूँ!

मूर्ति निराकृति मैं, बालू के
पत्थर में गढ़ दिया गया हूँ!

कानों में डालकर उँगलियाँ
सुनता हूँ दूर के धड़ाके;
आँख बंद कर मैं सहता हूँ,
बेंतों के बेरहम सड़ाके!

भागकर कहाँ जा सकता हूँ,
हवा में जकड़ दिया गया हूँ!

बेमतलब बोलती ज़ुबाँ है,
अनचाहे घूमती नज़र है;
क़त्लगाह को जाने वाली
पिंजड़ागाड़ी मेरा घर है।

लावारिस कुत्ते-सा यों ही
सड़क पर पकड़ लिया गया हूँ!

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