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देह 10 कविताएं

प्रताप सोमवंशीप्रताप सोमवंशी
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1-आंखें
आंखे देखती हैं एक पल
उसके बाद सोचती हैं
फिर खर्चती है समय
पहचानने और परखने में
यह तय करने में
थोड़ा और वक्त लगाती हैं कि
होंठों को कहां तक और कितना
बताने की अनुमति दी जाए
आंखों की देखने से होंठों के बोलने तक की यात्रा
एक रियाज है
सुर-लय-ताल के साथ निर्वाह की
दरअसल कहीं कुछ भी बिखरा तो
बेसुरा हो जाता है जीवन


2- उंगलियां
सुबह सुबह स्कूल जाते एक बच्चे के साथ हैं
दादी बनकर
जो उसे सड़क के हर दाएं बाएं के जोखिम से बचा रही है
शाम को बाजार से लौटते समय
जवान उंगलियां
अपनी बूढ़ी दादी को दे रही है अहसास कि
लड़खड़ाहट के पहले वो थाम लेगीं उसे
सुबह, दोपहर,शाम हो या रात
पूरे संस्कार में रहती हैं उंगलियां
ये अपनी नहीं भूलती अपना धर्म
बशर्ते हमारी आस्था बनी रहे
इन उंगलियों पर


3-मुंह
स्वतंत्र है मुंह
कहीं भी कुछ भी बोल दे
गलत हुआ तो गुनाह आंखों का
उन्होंने ऐसा देखा ही क्यों
कान के सिर पर भी चढ़ा देता दो पाप
कि तुमने सुना ही क्यों
और नाक ने गलत क्यों सूंघा
दिमाग के मत्थे तो
आसानी से मढ़ा जा सकता है दोष
कि उसने सोचा नहीं होता वैसा
तो नहीं होता ऐसा
मुंह का इतना बेअंदाज होना ठीक नहीं
हे आंख, कान, नाक और दिमाग
इस मुंह को संभालकर रखा करों


4-पीठ
किसी की भी हो पीठ
काम है लादना और ढोना
कैसे? यह सिखाता है हमें एक कुली
जो बरतता है सबसे बेहतर तरीके से अपनी पीठ
जिस पर ढो ले जाता है अपना पूरा परिवार
होता यूं है कि
उसकी गरदन को पड़ता है झुकाव का अभ्यास
कमर में लोच
की रीढ़ टूटने से बची रहे
इस तरह पीठ का भार गरदन और कमर के साथ
बराबर अनुपात में बंट जाता है
नई दिल्ली स्टेशन पर
एक नंबर से सोलह नंबर प्लेटफार्म तक
कुली इसी तरह आता-जाता है
पीठ और पैसेंजर दोनों प्रसन्न हैं


5-नाक
सूंघ तो लेती है सबकुछ
सही और सटीक
बोलने से बचती है
संकोची है आंखों से भी ज्यादा
डरती है मर्यादा के मूर्तिभंजन से
इसलिए सांस लेने में संकट हो तब भी
अकसर चुप रहती है नाक


6-जीभ
अपयश के कितने मुहावरे हैं उसके नाम
लंबी, काली, चटोरी और क्या- क्या
अपनी मर्जी से क्या कर सकती है जीभ
दांतों की इजाजत न हो तो घर से बाहर झांक भी नहीं सकती है
दिमाग जितना आदेश करे
उतना ही वह हिलती है
पेट की जरूरत पर
स्वाद उस तक पहुंचाती है
देह के किसी हिस्से को
तकलीफ हो
सबसे पहले उसका रंग उतर जाता है
तभी तो देख लेते हैं डॉक्टर
जीभ के चेहरे पर देह के दर्द के निशान


7-दिमाग
सबसे खुराफाती है देह में दिमाग
उपर बैठा सबपर हूकूमत करता रहता है
जो बुरा है, उसके लिए वजहें है
जो भला है सब उसका है
कोई कुछ भी बोले, देखे, सुने या समझे
बदल देता है उसका अर्थ
सब निर्भर हैं उसपर
जरा सा ढीला पड़ा तो
सब लुढ़कने लगते हैं
ऐसे में जरूरी है कि
सब मिलकर इसे सही काम में लगाए रखें
क्योंकि इसकी अक्षय उर्जा से ही चलती है
देह की पूरी गाड़ी


8-दिल
भावुक, बच्चा, बेवकूफ, बदतमीज
क्या क्या विशेषण नहीं है एक दिल के पास
इसके बारे में कह तो कोई भी कुछ सकता है
समझने की सामर्थ्य मुश्किल से आती है
सच यह है कि
जब सारे उपलब्ध तर्क हार जाते हैं
थकान पूरी देह को कब्जे में ले रही होती है
नजदीक की चीजें भी धुंधली दिखाई देती हैं
खुद अपने हाथ, पैर, आंख से भरोसा उठने जैसा होता है
दिल तभी प्रवाहित करता है
अपनी संचित संवेदना का द्रव
पहुंचता है उर्जा में रूपातंरित होकर दिमाग तक
ताकि वह शुरू कर सके फिर सोचना
आंखों को उसी द्रव से मिलती है दृष्टि
इससे वे देख पाती हैं उम्मीदों के दरवाजे की दिशा
अपनी उपेक्षा और अनादर से ऊपर उठते हुए
दिल करता है वो सारे काम
जो देह के हित में हो


9-हाथ
देह में सबसे ताकतवर है हाथ
पैर न भी हो तो पूरी देह खीचने के दृश्य
दिखाई पड़ते हैं अलग-अलग चौराहों पर
भाग्य जहां रहे तहां रहे
ये खुद तोड़ सकते हैं अपनी मेहनत के फल
किसी गिरे को उठा लेते है, निकाल लेते हैं गढढे से बाहर
किसी के सिर पर हों तो
जरूरत नहीं होती किसी साये की
साथ हों तो
दो और दो का जोड़ 22 गिना जाता है
पीठ पर हों तो पहाड़ पार करने की ताकत आ जाती है
हाथ के साथ सबकुछ शुभ है, श्रेष्ठ भी
शर्त इतनी है कि
ये रहें सकारत्मकता के संगीत के साथ


10-पांव
भले ही खड़ी हो पूरी देह इन पर
पूजने के बहुतेरे प्रतीक जुड़े हों पांवों के साथ
पर कोई नहीं गिनता औकात इनकी
ये खुद भी संकोची इतने कि
अपनी थकन को जाहिर करने से बचते हैं
रात-दिन कोई कहीं जोत दे, चले जाते हैं
लौटकर आते हैं चुपचाप सो जाते हैं
अनुशासित इतने हैं कि
गलत दिशा में चलने से पहले ठिठकते हैं
सड़क पर चलते समय
नीचे चीटीं आने से बचते हैं
देह की पूरी संरचना में
अपने श्रम और उपयोगिता के लिए
जाने जातें हैं पांव
इसलिए जरूरी है कि
देह के इतिहास में
तय की जाए इनकी सही जगह.

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