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फूलों और किताबों से आरास्ता

Parveen ShakirParveen Shakir
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फूलों और किताबों से आरास्ता[1] घर है
तन की हर आसाइश देने वाला साथी
आँखों को ठंडक पहुँचाने वाला बच्चा
लेकिन उस आसाइश, उस ठंडक के रंगमहल में
जहाँ कहीं जाती हूँ
बुनियादों में बेहद गहरे चुनी हुई
एक आवाज़ बराबर गिरयः[2] करती है
मुझे निकालो !
मुझे निकालो !

1सुसज्जित
2विलाप

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