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ज़िंदगी का किस के लिए मातम रहे

Pandit Brij Mohan Dattatreya KaifiPandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi
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ज़िंदगी का किस के लिए मातम रहे
मुल्क बस्ता है मिटे या हम रहे

दिल में पीरी में भी तेरा जवाँ
आख़िरी दम तक यही दम-ख़म रहे

चाहिए इंसान का दिल हो ग़नी
पास माल ओ ज़र बहुत या कम रहे

क्या इसी जन्नत की ये तहरीस है
जिस में कुछ दिन हज़रत-ए-आदम रहे

वस्ल में मतलब न रख तू इश्क़ का
दम भरे जा दम में जब तक दम रहे

लाग इक दिन बन के रहती है लगाओ
हाँ लगावट कुछ न कुछ बाहम रहे

इश्क़ ने जिस दिल पे क़ब्ज़ा कर लिया
फिर कहाँ इस में नशात ओ ग़म रहे

शर्क़ से जब नूर चमका तो कहाँ
बर्ग-ए-गुल पर क़त्र-ए-शबनम रहे

हुस्न की दुनिया का है दाएम शबाब
हश्र तक उस का यही आलम रहे

है सुरूर-ए-हुस्न ‘कैफ़ी’ ला-यज़ाल
दर ख़ुर-ए-ज़र्फ़ उस में बेश ओ कम रहे

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