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सूरत-ए-हाल अब तो वो नक़्श-ए-ख़याली हो गया

Pandit Brij Mohan Dattatreya KaifiPandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi
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सूरत-ए-हाल अब तो वो नक़्श-ए-ख़याली हो गया
जो मक़ाम-ए-मा-सिवा था दिल में ख़ाली हो गया

मुम्तना जो था वो है ज़ेब-ए-बदाहत क़ल्ब को
जो यक़ीनी अम्र था वो एहतिमाली हो गया

छोड़ी ख़ुद-बीनी तो अब हर शय में हुस्न आया नज़र
दीद-ए-हक़-बीं जलाली से जमाली हो गया

ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा ये है आँखों पर अब रखता हूँ मैं
ज़र्रे ज़र्रे को जो नज़र-ए-पाएमाली हो गया

ज़ोम और पिंदार का हक़-उल-यक़ीं से है बदल
वो घरोंदा अब तो फ़ानूस ख़याली हो गया

आँख उठ कर हुस्न-ए-कुदरत से है जो अपने पर गई
सब ख़ुदी का रंग रंग इंफ़िआली हो गया

पहले इस में सर था ऐ समासम इश्क़ और जान थी
क्यूँकि मिलता तुझ से आ अब हाथ ख़ाली हो गया

ग़ैरत दिल-दादा ओ दिल-दार की जाती रही
अब तो जो होना था ऐ आक़ा-ए-आली हो गया

वजह इल्म ज़ात हो क्यूँकर न इरफ़ान-ए-सिफ़त
क्या अर्ज़ की शान जब जौहर से ख़ाली हो गया

जो रहा ख़ुद-दार होने पर ख़ुदी से दूर दूर
वो दयार-ए-इश्क़ ओ दिल-सोज़ी का वाली हो गया

है ख़ता उस को अगर आशिक़ कहो तुम जिस का इश्क़
ख़त्म जब उस ने मुराद इक अपनी पाली हो गया

जज़्बा-ए-ईसार क्या क़ुव्वत-ए-अमल की फिर कहाँ
जब शुऊर इंसाँ का सर्फ़ ला-उबाली हो गया

ऐ क़दामत-केश सुन ये आलम ईजाद है
नाम जिद्दत का अज़ल में ला-यज़ाली हो गया

छोड़ कर लुत्फ़-ए-सुख़न मग़्ज-ए-सुख़न से काम लो
क्या हुआ ‘कैफ़ी’ जो गर्म-ए-ख़ुश मक़ाली हो गया

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