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सबरा और शत्तिला

Neelabh Ashk (Poet)Neelabh Ashk (Poet)
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सबरा और शत्तिला
रात घिरी और क़ातिल आए
देख¨ उनकी शातिर चाल
घिरने लगे ज़ुल्म के साए
धरती हुई ख़ून से लाल

दूर दूर तक शोले लपके
बच्चे-बूढ़े हुए हलाक़
जहाँ बसी थी बस्ती, देखो,
वहाँ उड़ रही केवल ख़ाक

2.

कहाँ से आई तुम्हारे अन्दर
इतनी नफ़रत और बरबरियत,
मेनाख़िम बेगिन ?

तालमुद की किन आयतों से
हासिल किया तुमने
बेगुनाहों के क़त्ले-आम का फ़रमान ?

किसके इशारों पर
बेघर कर रहे हो तुम
फ़िलिस्तीनियों को --

तुम जो सदियों तक बेघरबार रहने की
व्यथा से परिचित हो ?

देखो, ढह रहा है बेरूत
उजड़ रही है मध्यपूर्व की जन्नत
ख़ून-सने हाथों के छापे हैं
ग़ाज़ा की पीठ पर

उठती हैं
फ़िलिस्तीनी माँओं की चीख़ें
हर रात
यरुशलम की शोक की दीवार तले
उठता है हाहाकार
आँसू गैस के दूधिया धुएँ की तरह
विचलित होता है संसार

3.

राख हो गए हैं
मेसोपोटामिया और बैबिलॉन
रेत में धँस गए हैं मिस्र के पिरामिड
मँडराती है तूतनख़ामेन की रूह
अबू सिम्बल के अवशेषों में

लेकिन रिक्त नहीं हुआ है
जीवन के उत्सव का पात्र्
रिक्त नहीं हुई है
सम्मान से अपनी धरती पर
जीने की उत्कट अभिलाषा

देखो,
मेनाख़िम बेगिन, देखो,
फ़िलिस्तीनी युवक की आँखों
और उसकी संगीन की नोक पर
एक-सी चमक है
इस चमक को
तुम नहीं मिटा सकते, मेनाख़िम बेगिन

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