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आग़ोश-ए-तसव्वुर में जब मैं ने उसे मस़्का

Nazeer AkbarabadiNazeer Akbarabadi
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आग़ोश-ए-तसव्वुर में जब मैं ने उसे मस़्का

लब-हा-ए-मुबारक से इक शोर था ''बस बस'' का

सौ बार हरीर उस का मस़्का निगह-ए-गुल से

शबनम से कब ऐ बुलबुल पैराहन-ए-गुल मस़्का

उस तन को नहीं ताक़त शबनम के तलब्बुस से

ऐ दस्त-ए-हवस इस पर तू क़स्द न कर मस का

मलती है परी आँखें और हूर जबीं सा है

है नक़्श-ए-जहाँ यारो उस पा-ए-मुक़द्दस का

तर रखियो सदा या-रब तू इस मिज़ा-ए-तर को

हम इत्र लगाते हैं गर्मी में इसी ख़स का

इस गिर्या-ए-ख़ूनीं की दौलत से 'नज़ीर' अपने

अब कल्बा-ए-अहज़ाँ में कुल फ़र्श है अतलस का

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