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वृक्षत्व

Naresh MehtaNaresh Mehta
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माधवी के नीचे बैठा था

कि हठात् विशाखा हवा आयी

और फूलों का एक गुच्छ

मुझ पर झर उठा;

माधवी का यह वृक्षत्व

मुझे आकण्ठ सुगंधित कर गया ।


उस दिन

एक भिखारी ने भीख के लिए ही तो गुहारा था

और मैंने द्वाराचार में उसे क्या दिया ?-

उपेक्षा, तिरस्कार

और शायद ढेर से अपशब्द ।

मेरे वृक्षत्व के इन फूलों ने

निश्चय ही उसे कुछ तो किया ही होगा,

पर सुगंधित तो नहीं की ।


सबका अपना-अपना वृक्षत्व है ।

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