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ज़मिस्तानी हवा मे

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी

न छूटे मुझ से लंदन में भी आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी

कहीं सरमाया-ए-महफ़िल थी मेरी गर्म-गुफ़्तारी

कहीं सब को परेशाँ कर गई मेरी कम-आमेज़ी

ज़माम-ए-कार अगर मज़दूर के हाथों में हो फिर क्या

तरीक़-ए-कोहकन में भी वही हीले हैं परवेज़ी

जलाल-ए-पादशाही हो कि जम्हूरी तमाशा हो

जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी

सवाद-ए-रौमत-उल-कुबरा में दिल्ली याद आती है

वही इबरत वही अज़्मत वही शान-ए-दिल-आवेज़ी

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