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वजूद-ए-ज़न से है

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग

उसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ

शरफ़ में बढ़ के सुरय्या से मुश्त-ए-ख़ाक उस की

कि हर शरफ़ है इसी दर्ज का दुर-ए-मकनूँ

मुकालमात-ए-फ़लातूँ न लिख सकी लेकिन

उसी के शोले से टूटा शरार-ए-अफ़लातूँ

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