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तू ऐ असीर

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं

वो जल्वा-गाह तिरे ख़ाक-दाँ से दूर नहीं

वो मर्ग़-ज़ार कि बीम-ए-ख़िज़ाँ नहीं जिस में

ग़मीं न हो कि तिरे आशियाँ से दूर नहीं

ये है ख़ुलासा-ए-इल्म-ए-क़लंदरी कि हयात

ख़दंग-ए-जस्ता है लेकिन कमाँ से दूर नहीं

फ़ज़ा तिरी मह ओ परवीं से है ज़रा आगे

क़दम उठा ये मक़ाम आसमाँ से दूर नहीं

कहे न राह-नुमा से कि छोड़ दे मुझ को

ये बात राह-रव-ए-नुक्ता-दाँ से दूर नहीं

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