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सख़्तियाँ करता

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं

हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं

मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी

जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं

इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त

वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं

है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील

जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं

बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो

तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं

ढूँढता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को

आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं

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