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परेशाँ हो के

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

जो मुश्किल अब है या रब फिर वही मुश्किल न बन जाए

न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवाँ फ़िरदौस में हूरें

मिरा सोज़-ए-दरूँ फिर गर्मी-ए-महफ़िल न बन जाए

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को

खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

बनाया इश्क़ ने दरिया-ए-ना-पैदा-कराँ मुझ को

ये मेरी ख़ुद-निगह-दारी मिरा साहिल न बन जाए

कहीं इस आलम-ए-बे-रंग-ओ-बू में भी तलब मेरी

वही अफ़्साना-ए-दुंबाला-ए-महमिल न बन जाए

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं

कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए

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