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नाला है बुलबुल-

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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नाला है बुलबुल-ए-शोरीदा तिरा ख़ाम अभी

अपने सीने में इसे और ज़रा थाम अभी

पुख़्ता होती है अगर मस्लहत-अंदेश हो अक़्ल

इश्क़ हो मस्लहत-अंदेश तो है ख़ाम अभी

बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़

अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी

इश्क़ फ़र्मूदा-ए-क़ासिद से सुबुक-गाम-ए-अमल

अक़्ल समझी ही नहीं म'अनी-ए-पैग़ाम अभी

शेवा-ए-इश्क़ है आज़ादी ओ दहर-आशेबी

तू है ज़ुन्नारी-ए-बुत-ख़ाना-ए-अय्याम अभी

उज़्र-ए-परहेज़ पे कहता है बिगड़ कर साक़ी

है तिरे दिल में वही काविश-ए-अंजाम अभी

सई-ए-पैहम है तराज़ू-कम-ओ-कैफ़-ए-हयात

तेरी मीज़ाँ है शुमार-ए-सहर-ओ-शाम अभी

अब्र-ए-नैसाँ ये तुनुक-बख़्शी-ए-शबनम कब तक

मेरे कोहसार के लाले हैं तही-जाम अभी

बादा-गर्दान-ए-अजम वो अरबी मेरी शराब

मिरे साग़र से झिजकते हैं मय-आशाम अभी

ख़बर 'इक़बाल' की लाई है गुलिस्ताँ से नसीम

नौ-गिरफ़्तार फड़कता है तह-ए-दाम अभी

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