ला फिर इक बार's image
1 min read

ला फिर इक बार

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
0 Bookmarks 37 Reads0 Likes

ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी

हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी

तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद

अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी

मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी

शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी

शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही

रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी

इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने

इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी

सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात

हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी

तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख

तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts