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इस राज़ को इक

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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इस राज़ को इक मर्द-ए-फ़रंगी ने किया फ़ाश

हर-चंद कि दाना इसे खोला नहीं करते

जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में

बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते

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