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गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद न बेगाना-वार देख

है देखने की चीज़ इसे बार बार देख

आया है तू जहाँ में मिसाल-ए-शरार देख

दम दे न जाए हस्ती-ना-पाएदार देख

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

खोली हैं ज़ौक़-ए-दीद ने आँखें तिरी अगर

हर रहगुज़र में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा-ए-यार देख

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