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दयार-ए-इश्क़ में

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर

नया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा कर

ख़ुदा अगर दिल-ए-फ़ितरत-शनास दे तुझ को

सुकूत-ए-लाला-ओ-गुल से कलाम पैदा कर

उठा न शीशागरान-ए-फ़रंग के एहसाँ

सिफ़ाल-ए-हिन्द से मीना ओ जाम पैदा कर

मैं शाख़-ए-ताक हूँ मेरी ग़ज़ल है मेरा समर

मिरे समर से मय-ए-लाला-फ़ाम पैदा कर

मिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी है

ख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर

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