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अगर कज-रौ हैं अंजुम

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा

मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा

अगर हंगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली

ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा

उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर

मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या मेरा

मोहम्मद भी तिरा जिबरील भी क़ुरआन भी तेरा

मगर ये हर्फ़-ए-शीरीं तर्जुमाँ तेरा है या मेरा

इसी कौकब की ताबानी से है तेरा जहाँ रौशन

ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़ियाँ तेरा है या मेरा

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