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मुझे नहीं मालूम

Mohan RanaMohan Rana
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मुझे नहीं मालूम
नहीं मालूम कि तुम जानना क्या चाहते हो !
यही बचाव
सफाई मैं देता रहा
सच के सवाल पर
और वे पूछते रहे फिर भी
उन्हें सच पर शक था
वह अजनबी था उनके संसार में


और मैं
ले जाता अपने वज़न से कई गुना झूठ
यहाँ से वहाँ
उसे सच समझ कर


डूबता हुआ सूरज छोड़ गया
सुनहरे कण पत्तों पर,
पेड़ उन्हें धरती में ले गया अपनी जड़ों में
और कुछ मैंने छुपा लिए पलकों में
बुरे मौसम की आशंका में,
किसी दरार को सींते हुए

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