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गदा दस्त-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

Mirza Mohammad rafi 'SaudaMirza Mohammad rafi 'Sauda
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गदा दस्त-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

हम अपना ही दम और क़दम देखते हैं

न देखा जो कुछ जाम में जम ने अपने

सो यक क़तरा-ए-मय में हम देखते हैं

ये रंजिश में हम को है बे-इख़्तियारी

तुझे तेरी खा कर क़सम देखते हैं

ग़रज़ कुफ़्र से कुछ न दीं से है मतलब

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

हुबाब-ए-लब-ए-जू हैं ऐ बाग़बाँ हम

चमन को तिरे कोई दम देखते हैं

नविश्ते को मेरे मिटाते हैं रो रो

मलाएक जो लौह ओ क़लम देखते हैं

मिटा जाए है हर्फ़ हर्फ़ आँसुओं से

जो नामा उसे कर रक़म देखते हैं

अकड़ से नहीं काम सुम्बुल की हम को

किसी ज़ुल्फ़ का पेच ओ ख़म देखते हैं

ख़ुदा दुश्मनों को न वो कुछ दिखाए

जो कुछ दोस्त से अपने हम देखते हैं

सितम से किया तू ने हम को जो ख़ूगर

करम से तिरे हम सितम देखते हैं

मगर तुझ से रंजीदा-ख़ातिर है 'सौदा'

उसे तेरे कूचे में कम देखते हैं

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