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मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब

Mir Taqi MirMir Taqi Mir
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मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब अश्कबार पाया
अल क़िस्सा 'मीर' को हमने बेइख़्तियार पाया

शहर-ए-दिल एक मुद्दत उजड़ा बसा ग़मों में
आख़िर उजाड़ देना उसका क़रार पाया

इतना न दिल से मिलते न दिल को खो के रहते
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया

क्या ऐतबार याँ का फिर उस को ख़ार देखा
जिसने जहाँ में आकर कुछ ऐतबार पाया

आहों के शोले जिस् जाँ उठे हैं 'मीर' से शब
वाँ जा के सुबह देखा मुश्त-ए-ग़ुबार पाया

 

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