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कबहूँ न करते बंदगी

Maluk DasMaluk Das
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कबहूँ न करते बंदगी , दुनियाँ में भूले .
आसमान को तकते ,घोड़े बहु फूले .
सबहिन के हम सभी हमारे .जीव जन्तु मोंहे लगे पियारे.
तीनों लोक हमारी माया .अन्त कतहुँ से कोई नहिं पाया.
छत्तिस पवन हमारी जाति. हमहीं दिन औ हमहीं राति.
हमहीं तरवर कित पतंगा. हमहीं दुर्गा हमहीं गंगा.
हमहीं मुल्ला हमहीं काजी. तीरथ बरत हमारी बाजी.
हहिं दसरथ हमहीं राम .हमरै क्रोध औ हमरे काम.
हमहीं रावन हमहीं कंस.हमहीं मारा अपना बंस.

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