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तुम हमारे नहीं तो क्या ग़म है

Kunwar Mohinder Singh BediKunwar Mohinder Singh Bedi
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तुम हमारे नहीं तो क्या ग़म है

हम तुम्हारे तो हैं ये क्या कम है

बाल बिखरे हैं आँख पुर-नम है

मर गया कौन किस का मातम है

हुस्न की शोख़ियाँ ज़रा देखो

गाह शो'ला है गाह शबनम है

मुस्कुरा दो ज़रा ख़ुदा के लिए

शम-ए-महफ़िल में रौशनी कम है

छा रही हैं घटाएँ सावन की

ज़ुल्फ़-ए-गर्दूं भी आज बरहम है

बन गया है ये ज़िंदगी अब तो

तुझ से बढ़ कर हमें तिरा ग़म है

चाक दामन है किस लिए गुल का

किस लिए अश्क-रेज़ शबनम है

महफ़िल-ए-रक़्स हो कि शे'र-ओ-शराब

तुम नहीं हो तो बज़्म-ए-मातम है

हर मसर्रत अलम का है परतव

जो ख़ुशी है अमानत-ए-ग़म है

इस में आँसू भी हैं तबस्सुम भी

ज़िंदगी इक तज़ाद-ए-पैहम है

शैख़ साहब जराहत-ए-दिल का

आप के पास कोई मरहम है

इस को सज्दे किए फ़रिश्तों ने

आदमी है ये इब्न-ए-आदम है

 

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