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उस दिन संध्या को

Kuber Nath RaiKuber Nath Rai
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उस दिन संध्या को
दृष्टि अभिसार द्वारा मैंने पहचाना तुम्हें पुनः पुनः
मैंने पुकारा तुम्हें मन ही मन बार बार!

अपनी ही सांत्वना के नये नये नामों से
यद्यपि पराजित क्षुब्ध राक्षसों ने किया था शोर
तो भी मैंने पाया तुम्हें अचानक उस संध्या को
जैसे अपनी ही दरिद्र कंथा के भीतर छिपी
कोई भूली उज्ज्वल मणि,
जैसे अपनी ही दरिद्र अनगढ़ भाषा के बीच
कोई प्रखर तेजस्वी अभिव्यक्ति।
अथवा धरती की जीर्णता के मध्य लब्ध
अनुत्तरा ऋतुओं की मधुमती ऋद्धि!

उस दिन अचानक तुम्हें देख कर
सहस्र-सहस्र चन्द्रमाओं की भव्यता में
धोया अपना मुँह बार-बार,
किया प्रशान्त-स्नान बारबार!
(चन्द्रिका भी कितनी क्षुरधार होती है)

तब मुझे लगा कि तुम तुम हो
यानी जन्मान्तर से मेरे भीतर ढकी अज्ञात कंथा मणि हो
जिसने मुझको ही सर्वसम्मत आज उद्घाटित किया है।
और तब उस अपूर्व सहस्रदल उद्घाटन को देख
उन लोगों की तिजोरियों में कैद,
खनकते सिक्कों ने किया था अश्रुपात!
और उद्धत अभिमानी अहंकारियों ने शीश झुका
किया था मेरा नमन बार-बार।

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