वहशी थे बू-ए-गुल की तरह इस जहाँ में हम's image
3 min read

वहशी थे बू-ए-गुल की तरह इस जहाँ में हम

Khwaja Haider Ali AatishKhwaja Haider Ali Aatish
0 Bookmarks 142 Reads0 Likes

वहशी थे बू-ए-गुल की तरह इस जहाँ में हम

निकले तो फिर के आए न अपने मकाँ में हम

साकिन हैं जोश-ए-अश्क से आब-ए-रवाँ में हम

रहते हैं मिस्ल-ए-मर्दुम-ए-आबी जहाँ में हम

शैदा-ए-रू-ए-गुल न तो शैदा-ए-क़द्द-ए-सर्व

सय्याद के शिकार हैं इस बोस्ताँ में हम

निकली लबों से आह कि गर्दूं निशाना था

गोया कि तीर जोड़े हुए थे कमाँ में हम

आलूदा-ए-गुनाह है अपना रियाज़ भी

शब काटते हैं जाग के मुग़ की दुकाँ में हम

हिम्मत पस-अज़-फ़ना सबब-ए-ज़िक्र-ए-ख़ैर है

मुर्दों का नाम सुनते हैं हर दास्ताँ में हम

साक़ी है यार-ए-माह-लिक़ा है शराब है

अब बादशाह-ए-वक़्त हैं अपने मकाँ में हम

नैरंग-ए-रोज़गार से ऐमन हैं शक्ल-ए-सर्व

रखते हैं एक हाल बहार-ओ-ख़िज़ाँ में हम

दुनिया ओ आख़िरत में तलबगार हैं तिरे

हासिल तुझे समझते हैं दोनों जहाँ में हम

पैदा हुआ है अपने लिए बोरिया-ए-फ़क़्र

ये नीस्ताँ है शेर हैं इस नीस्ताँ में हम

ख़्वाहाँ कोई नहीं तो कुछ इस का ओजब नहीं

जिंस-ए-गिराँ-बहा हैं फ़लक की दुकाँ में हम

लिक्खा है किस के ख़ंजर-ए-मिज़्गाँ का उस ने वस्फ़

इक ज़ख़्म देखते हैं क़लम की ज़बाँ में हम

क्या हाल है किसी ने न पूछा हज़ार हैफ़

नालाँ रहे जरस की तरह कारवाँ में हम

आया है यार फ़ातिहा पढ़ने को क़ब्र पर

बेदार बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता है ख़्वाब-ए-गिराँ में हम

शागिर्द तर्ज़-ए-ख़ंदा-ज़नी में है गुल तिरा

उस्ताद-ए-अंदलीब हैं सोज़-ओ-फ़ुग़ाँ में हम

बाग़-ए-जहाँ को याद करेंगे अदम में क्या

कुंज-ए-क़फ़स से तंग रहे आशियाँ में हम

अल्लाह-रे बे-क़रारी-ए-दिल हिज्र-ए-यार में

गाहे ज़मीं में थे तो गहे आसमाँ में हम

दरवाज़ा बंद रखते हैं मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर

क़ुफ़्ल-ए-दुरून-ए-ख़ाना हैं अपने मकाँ में हम

'आतिश' सुख़न की क़द्र ज़माने से उठ गई

मक़्दूर हो तो क़ुफ़्ल लगा दें ज़बाँ में हम

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts