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वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा

Kedarnath SinghKedarnath Singh
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बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर हैं

वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुआँ-धुआँ-सा

वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
 

तुम कभी देखना

 
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएं
कुत्ते-भुनगे-आदमी-गिलहरी-गाएं

यह शहर कि जिसकी जिद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आजादी

तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में

साथियों, रात आई...

 
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूं
इस आने-जाने का वेतन पाता हूं

जब आंख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं जंजीरें

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