संवाद's image
1 min read

संवाद

Jagdish GuptJagdish Gupt
0 Bookmarks 117 Reads0 Likes

लेखनी विश्राम करती रही
रोग-निरोग का क्रम तो
चलता ही रहता है
पर लेखनी क्यों थक गई ?

अब मैं मन-ही-मन
लेखनी सम्वाद करने लगा हूँ
बहुत कुछ ऐसा है
लेखनी भी नहीं कह पाती
और वह रेखाओं में उभर आता है
पर इधर रेखाएँ चुप रहीं ।

अन्तर्लीनता के क्षण
बहुत कठिनाई तुल्य हो गए
ये भी संयोग से ही मिलते हैं ।

अब इस संयोग का
सुख लूँ तो बुरा क्या होगा
अब तो लेखनी भी चुप है
उसकी ओर से अब
मुझे ही बोलना है ।

(जगदीश गुप्त की अन्तिम कविता)

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts