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ये जिस्म ज़ार है यूँ पैरहन के पर्दे में

IMAM BAKHSH NASIKHIMAM BAKHSH NASIKH
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ये जिस्म ज़ार है यूँ पैरहन के पर्दे में

कि जैसे रूह निहाँ है बदन के पर्दे में

सिवाए अहल-ए-सुख़न हो मुशाहिदा किस को

निहाँ है शाहिद-ए-मा'नी सुख़न के पर्दे में

तलाश जिस की है दिन-रात तुझ को ऐ ग़ाफ़िल

छुपा हुआ है वो तेरे ही तन के पर्दे में

जो अंदलीब की आँखों से देखे वो समझे

ज़ुहूर है उसी गुल का चमन के पर्दे में

शब-ए-सियाह जुदाई में रौशनी हो कहीं

लगाऊँ आग मैं बैत-उल-हुज़न के पर्दे में

तरीक़-ए-इश्क़ छुड़ाया है तू ने ग़ारत-गर

मिला है ख़िज़्र मुझे राहज़न के पर्दे में

लताफ़त ऐसी है तुझ में कि देखता हूँ साफ़

गुहर से दाँत हैं दुर्ज-ए-दहन के पर्दे में

ब-रंग-ए-ज़र कोई कपड़ों में आग रहती है

न मेरे दाग़ छुपेंगे कफ़न के पर्दे में

नक़ाब से तिरे अबरू जो सल्ख़ को खुल जाएँ

तू माह-ए-नूर है चर्ख़-ए-कुहन के पर्दे में

अगर तुम आए थे शीरीं के भेस में साहब

तो साथ बंदा भी था कोहकन के पर्दे में

नुमूद हो न तिरे ख़त्त-ए-अम्बर-ए-अफ़्शाँ की

रहे वो जिल्द एज़ार-ओ-ज़क़न के पर्दे में

चमन में लाई सबा किस की बू जो आज शमीम

दमक रही है गुल-ए-यासमन के पर्दे में

नज़र से था शरर-ए-संग की तरह जो निहाँ

वो बुत मिला मुझे इक बुत-शिकन के पर्दे में

तुम्हारे रू-ए-मुख़त्तत का मुँह चिढ़ाते हैं

ये मेहर-ओ-माह परी-रू गहन के पर्दे में

हज़ारों पड़ गए तीर-ए-निगाह से सूराख़

हमारे इस बुत-ए-नावक-फ़गन के पर्दे में

ख़बर न शाम-ए-ग़रीबी की मुझ को थी 'नासिख़'

छुपी हुई थी ये सुब्ह-ए-वतन के पर्दे में

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