सुब्ह आँख खुलती है एक दिन निकलता है's image
1 min read

सुब्ह आँख खुलती है एक दिन निकलता है

Hasan AbidiHasan Abidi
0 Bookmarks 55 Reads0 Likes

सुब्ह आँख खुलती है एक दिन निकलता है
फिर ये एक दिन बरसों साथ साथ चलता है

कुछ न कुछ तो होता है इक तेरे न होने से
वरना ऐसी बातों पे कौन हाथ मलता है

क़ाफ़िले तो सहरा में थक के सो भी जाते हैं
चाँद बादलों के साथ सारी रात चलता है

दिल चराग़-ए-महफ़िल है लेकिन उस के आने तक
बार बार बुझता है बार बार जलता है

कुल्फ़तें जुदाई की उम्र भर नहीं जातीं
जी बहल तो जाता है पर कहाँ बहलता है

दिल तपान नहीं रहता मैं ग़ज़ल नहीं कहता
ये शरार अपनी ही आग से उछलता है

मैं बिसात-ए-दानिश का दूर से तमाशाई
देखता रहा शातिर कैसे चाल चलता है

 

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts