टूटा हुआ इंसान's image
2 min read

टूटा हुआ इंसान

Harivansh Rai BachchanHarivansh Rai Bachchan
0 Bookmarks 939 Reads0 Likes

टूटा हुआ इंसान
(मुक्तिबोध का शव देखने की स्मृति)*

...और उसकी चेतना जब जगी
मौजों के थपेड़े लग रहे थे,
आर-पार-विहीन पारावार में
वह आ पड़ा था,
किंतु वह दिल का कड़ा था।
फाड़ कर जबड़े हड़पने को
तरंगो पर तरंगे उठ रही थीं,
फेन मुख पर मार कर अंधा बनातीं,
बधिर कर, दिगविदारी
क्रूर ध्वनियों में ठठाती
और जग की कृपा, करुण सहायता-संवेदना से दूर
चारो ओर के उत्पात की लेती चुनौती
धड़कती थी एक छाती।

और दोनों हाँथ
छाती से सटाये हुए थे
कुछ बिम्ब, कुछ प्रतिबिम्ब, कुछ रूपक अनोखे
शब्द कुछ, कुछ लयें नव जन्मी, अनूठी-
ध्वस्त जब नौका हुई थी
वह इन्ही को बचा लाया था
समझ अनमोल थाती!
और जब प्लावन-प्रलय का सामना हो
कौन संबल कौन साथी!

इन तरंगों, लहर, भँवरो के समर में
टूटना ही, डूबना ही था उसे
वह टूट कर डूबा, मगर
कुछ बिम्ब, कुछ प्रतिबिम्ब, कुछ रूपक अनोखे
आज भी उतरा रहे हैं
और उसके साहसी अभियान की
सहसा उठे तूफान की
टूटे हुए जलयान की
जल और नभ में ठने रन घमासान में
टूटे हुए इंसान की
गाथा सुनाते जा रहे हैं।

मुक्तिबोध की मृत्यु का समाचार सुबह पत्र में पढ कर मैं अस्पताल पहुँचा। एक कर्मचारी नें एक कमरे का ताला खोल कर मुझे उनकी लाश दिखायी जो वहाँ अकेली एक नीली चादर में लिपटी पड़ी थी। कमरे से बाहर निकलते हुए मेरी दृष्टि दरवाजे पर गई, उस पर लिखा था - 'ट्वायलेट' - हरिवंश राय बच्चन।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts