काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी's image
1 min read

काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी

GulzarGulzar
0 Bookmarks 50 Reads0 Likes

काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी

तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं

सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी

दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में

मेरे साथ चला आया है आप का इक सौदाई भी

कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें रोज़ फ़लक

सुब्ह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी

उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी

कल साहिल पर लेटे लेटे कितनी सारी बातें कीं

आप का हुंकारा न आया चाँद ने बात कराई भी

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts